Thursday, March 12, 2020



शीर्षक –‘रात भर' 

“ तारों के नीचे बैठीं ,सपने सजाती रात भर ।
ओंस की आगोश में, मदहोश रही रात भर ।।

ढूंढ़ती हूॅ॑ खुद को ,खुद की आवाज में ।
आॅ॑खों में सुरमई, ख्वाब लिए रात भर ।।

जिस्म की लम्स में, शव सी पड़ी ।
कोई तो मखमली सी, आवाज दें ।।

सन्नाटें के शोर में,हवाओं ने छेड़ा रातभर ।
 कोई तो जगाएं इन, सपनों को राग से ।।"

रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

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